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Electricity:अब गांवों में फ्री बिजली पर ब्रेक लगाने का आ गया है वक्त, जानिए क्या है वजह

Electricity:अब गांवों में फ्री बिजली पर ब्रेक लगाने का आ गया है वक्त, जानिए क्या है वजह

Electricity:अब गांवों में फ्री बिजली पर ब्रेक लगाने का आ गया है वक्त, जानिए क्या है वजह

Electricity: चुनाव के समय राजनीतिक दल मुफ्त उपहार देने की होड़ में लगे रहते हैं। कुछ तो किफायती होते हैं, लेकिन गांवों में फ्री बिजली ऐसी नहीं है।

पंजाब, जो कभी सबसे अमीर राज्य था, अब औसत से थोड़ा ऊपर ही रह गया है। इसका एक बड़ा कारण है मुफ्त ग्रामीण बिजली, जिसने भारी राजकोषीय घाटा पैदा कर दिया है।

इससे यह भारत का सबसे अधिक कर्जदार राज्य बन गया है। यह प्रदेश बुनियादी ढांचे और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा में निवेश करना तो दूर की बात, वेतन देने में भी असमर्थ है।

पंजाब पर मौजूदा कर्ज का 80 फीसदी मुफ्त बिजली के कारण है, जो अन्य सभी राज्यों के लिए एक चेतावनी है। यहीं नहीं अब एक नई और अधिक भयावह चेतावनी आती दिख रही है।

जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए, पेट्रोल और डीजल जैसे जीवाश्म ईंधन को फेज आउट किया जा रहा है। सभी ट्रांसपोर्ट और ग्रामीण मशीनों का विद्युतीकरण समय के साथ तेजी से आगे बढ़ रहा।

इसलिए, जैसे-जैसे गाड़ियों में पेट्रोल और डीजल की जगह बिजली का इस्तेमाल बढ़ेगा, ग्रामीण क्षेत्रों में इसकी मांग आसमान छूने लगेगी। ऐसे में मुफ्त ग्रामीण बिजली की बजटीय लागत बढ़ जाएगी।

इलेक्ट्रिक ट्वी-व्हीलर्स की बढ़ी डिमांड

दोपहिया वाहनों का विद्युतीकरण तेजी से आगे बढ़ रहा है। पिछली तिमाही में इलेक्ट्रिक टूव्हीलर्स की बिक्री में 34 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज हुई।

2023-24 में इसकी कुल बिक्री 1.5 मिलियन को पार कर जाएगी। एक इलेक्ट्रिक टूव्हीलर की कीमत पेट्रोल से चलने वाली बाइक से अधिक होती है, लेकिन इसकी चलने की लागत बहुत सस्ती होती है।

पेट्रोल पर इतना अधिक टैक्स लगाया जाता है कि इलेक्ट्रिक टू-व्हीलर चलाने की आजीवन लागत पहले से ही पेट्रोल आधारित गाड़ियों की तुलना में बहुत कम है।

कंज्यूमर्स अपने मौजूदा टूव्हीलर्स को नहीं छोड़ेंगे, लेकिन नई खरीद बड़े पैमाने पर इलेक्ट्रिक विकल्पों की होगी।

थ्रीव्हीलर्स गाड़ियों में ये तेजी से देखने को मिल रहा है, जहां आजीवन लागत महत्वपूर्ण है।

गांवों में फ्री बिजली से लोगों का ज्यादा फायदा

इलेक्ट्रिक टूव्हीलर किफायती हैं, भले ही उपभोक्ता बिजली के लिए भुगतान कर रहे हों। जैसे कि शहरों में देखने को मिला है।

लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में, जहां बिजली फ्री या लगभग मुफ्त है, इलेक्ट्रिक टूव्हीलर्स की लागत में जबरदस्त फायदा है। जल्द ही बाजार लगभग पूरी तरह से इलेक्ट्रिक हो जाएगा।

ग्रामीण क्षेत्रों में मोटरसाइकिल पर्सनल ट्रांसपोर्ट का एक मानक रूप बन गई है।

मैंने चार साल पहले गुजरात में एक रिसर्च प्रोजेक्ट में पाया कि सरदार सरोवर बांध के विस्थापित आदिवासियों में से, जो अब मुख्यधारा के गांवों में बस गए हैं, 61% के पास मोटरसाइकिलें थीं।

उनके पहले के पड़ोसियों में से जो अभी भी जंगल के गांवों में रहते हैं, 31 फीसदी के पास मोटरसाइकिलें थीं। यह प्रतिशत बढ़ता ही रहेगा।

इलेक्ट्रिक कारों की भी बढ़ रही बिक्री

ग्रामीण क्षेत्रों में इलेक्ट्रिक कारों की बिक्री भी बढ़ रही है, खासकर पंजाब और हरियाणा जैसे बड़े किसानों वाले राज्यों में।

जब भी किसी परियोजना के लिए भूमि अधिग्रहण होता है, तो किसान अपने मुआवजे के पैसे से कार खरीदते हैं। कारों का विद्युतीकरण टूव्हीलर की तुलना में अधिक समय लेगा।

लेकिन टाटा पहले से ही तीन इलेक्ट्रिक ब्रांड – टियागो, पंच और नेक्सॉन गाड़ियां बेच रहा है। महिंद्रा के पास एक इलेक्ट्रिक एसयूवी है।

इलेक्ट्रिक कार की लागत इलेक्ट्रिक दोपहिया वाहनों की तुलना में बहुत कम है। लेकिन अगर बिजली मुफ्त है, तो इलेक्ट्रिक कारें अनबीटेबल हो जाती हैं।

ग्रामीण क्षेत्रों में इलेक्ट्रिक कारों की बिक्री, विशेष रूप से वे जो शहरीकरण की ओर अग्रसर हैं, तेजी से बढ़ने की उम्मीद है।

हैवी व्हीकल्स का विद्युतीकरण अधिक कठिन होगा। लेकिन टेस्ला सहित कई वैश्विक कंपनियां पहले से ही इलेक्ट्रिक ट्रक बना रही हैं।

यह केवल समय की बात है कि सभी प्रकार की कृषि मशीनरी – ट्रैक्टर, कीटनाशक स्प्रेयर, कंबाइन हार्वेस्टर, हैप्पी सीडर – भी बिजली से संचालित होने लग जाएंगी।

इलेक्ट्रिक व्हीकल की प्रमुख लागत बैटरी में होती है। बैटरी की संख्या (और इसलिए लागत) जरूरी वर्कलोड के साथ बढ़ती है।

यह टूव्हीलर्स के लिए सबसे कम और ट्रैक्टर-ट्रकों के लिए सबसे अधिक है। लेकिन अगर बिजली मुफ्त है, तो इलेक्ट्रिक ट्रैक्टर, ट्रक और कंबाइन हार्वेस्टर जल्दी ही किफायती हो जाएंगे।

इलेक्ट्रिक गाड़ियों से कैसे सरकारों पर दोहरी मार

राज्य सरकारों को दोहरी मार झेलनी पड़ेगी। एक ओर, उन्हें मुफ्त या सब्सिडी वाली बिजली के लिए कहीं अधिक खर्च करना होगा।

दूसरी ओर, उन्हें पेट्रोल और डीजल की बिक्री से राजस्व का नुकसान होगा, जिस पर वे आज बहुत अधिक निर्भर हैं।

आरबीआई का अनुमान है कि राज्य सरकार के राजस्व का 28 फीसदी पेट्रोलियम उत्पादों पर टैक्स से आता है।

जलवायु परिवर्तन से निपटना और जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल का चरणबद्ध तरीके से खत्म किया जाना अच्छा लगता है,

लेकिन वे राज्यों के बजट को लेकर दुःस्वप्न पेश करते हैं। किसान आज मुफ्त में मिलने वाली बिजली को नहीं बेच सकते।

लेकिन जब इलेक्ट्रिक ट्रक और बसें आम हो जाएंगी, तो बड़े किसान इन वाणिज्यिक वाहनों को मामूली फीस पर चार्ज करने की पेशकश कर सकते हैं।

ट्रांसपोर्ट कंपनियां खेतों में लाइन लगाएंगी। इससे राज्य सरकार का मुफ्त बिजली का बिल और बढ़ जाएगा। मुफ्त बिजली के दुरुपयोग की जांच करना मुश्किल होगा।

राज्य सरकारों को बिजली पर सब्सिडी रोकना जरूरी

आगे का रास्ता क्या है? केंद्र और राज्य सरकारों को बिजली पर सब्सिडी देने की विनाशकारी प्रतिस्पर्धा को रोकने के लिए एक साथ आने की जरूरत है।

किसानों को बिजली के लिए भुगतान करना चाहिए, ताकि उन्हें इसके इस्तेमाल को संरक्षित करने के लिए प्रोत्साहन मिले।

बिजली की कीमतों को फसलों के मिनिमम सपोर्ट प्राइज (MSP) में रिफ्लेक्ट किया जा सकता है।

इसके अलावा, राज्य सरकारों की ओर से दी जाने वाली पीएम किसान और अन्य कैश अनुदान स्कीम को बढ़ाया जा सकता है।

यह राजनीतिक रूप से पेचीदा होगा। किसान पहले ही सड़कों को अवरुद्ध करने और ट्रांसपोर्ट को रोक की अपनी क्षमता दिखा चुके हैं।

वो निश्चित रूप से मुफ्त बिजली को समाप्त करने का विरोध करेंगे, लेकिन यह काम जरूरी है।

 

 

 

 

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Ajay Sharma

Indian Journalist. Resident of Kushinagar district (UP). Editor in Chief of Computer Jagat daily and fortnightly newspaper. Contact via mail computerjagat.news@gmail.com

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