मशरूम की खेती से सरस्वती ने लिखी आत्मनिर्भरता की कहानी
रिपोर्ट : कमलेश यादव
पडरौना कुशीनगर।विशुनपुरा विकासखंड की हिरनही ग्रामसभा के खलवा टोला निवासी सरस्वती देवी ने मेहनत और हौसले के दम पर स्वरोजगार की राह चुनी है। स्वयं सहायता समूह से 50 हजार रुपये का ऋण लेकर करीब डेढ़ वर्ष पहले मशरूम की खेती शुरू करने वाली सरस्वती अब सालाना डेढ़ लाख रुपये से अधिक की कमाई कर रही हैं। सीमित संसाधनों के बीच शुरू किया गया उनका यह छोटा प्रयास आज आय का मजबूत जरिया बन चुका है। उनकी सफलता ग्रामीण क्षेत्र की उन महिलाओं के लिए मिसाल बन रही है, जो कुछ अपना काम शुरू कर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनना चाहती हैं।
50 हजार के ऋण से शुरू किया कारोबार
धर्मवीर कुशवाहा की पत्नी सरस्वती देवी स्वयं सहायता समूह की अध्यक्ष भी हैं। करीब डेढ़ वर्ष पहले उन्होंने समूह से मिले 50 हजार रुपये के ऋण का इस्तेमाल मशरूम उत्पादन शुरू करने में किया। शुरुआत में उनके सामने उत्पादन, रखरखाव और बाजार तक उत्पाद पहुंचाने जैसी कई चुनौतियां थीं, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं छोड़ी। धीरे-धीरे अनुभव बढ़ा और मशरूम उत्पादन से आमदनी भी होने लगी। आज उनकी सालाना कमाई डेढ़ लाख रुपये से अधिक पहुंच चुकी है। सरस्वती का कहना है कि मेहनत और सही दिशा में प्रयास किया जाए तो कम पूंजी में भी स्वरोजगार शुरू किया जा सकता है।
दूसरी महिलाओं को भी दे रहीं प्रेरणा
सरस्वती देवी की कोशिश केवल अपनी आमदनी बढ़ाने तक सीमित नहीं है। स्वयं सहायता समूह की अध्यक्ष होने के नाते वह गांव की अन्य महिलाओं को भी स्वरोजगार के लिए प्रेरित करती हैं। वह महिलाओं को सरकारी योजनाओं और समूह के माध्यम से मिलने वाली सुविधाओं की जानकारी देकर उन्हें अपने पैरों पर खड़े होने के लिए प्रोत्साहित करती हैं। उनका मानना है कि ग्रामीण महिलाओं में हुनर की कमी नहीं है, जरूरत सिर्फ सही अवसर और मार्गदर्शन की है। मशरूम की खेती को उन्होंने इसी सोच के साथ अपनाया और अब दूसरी महिलाओं को भी इससे जोड़ने की तैयारी कर रही हैं।
चार महिलाएं भी शुरू करेंगी मशरूम की खेती
सरस्वती देवी की सफलता से प्रभावित होकर उनके स्वयं सहायता समूह की अनिता, गुड़िया, पूजा और आरती भी मशरूम की खेती शुरू करने की तैयारी में जुटी हैं। जल्द ही इन महिलाओं के उत्पादन शुरू करने की उम्मीद है। इससे समूह की अन्य महिलाओं को भी रोजगार का नया विकल्प मिलेगा। सरस्वती अब मशरूम उत्पादन को और बड़े स्तर पर करने की तैयारी में हैं। साथ ही उनका प्रयास है कि गांव की अधिक से अधिक महिलाएं इस काम से जुड़ें और अपनी आमदनी बढ़ाएं। उनके प्रयास से समूह की महिलाओं में भी स्वरोजगार को लेकर उत्साह बढ़ा है।
मेहनत से बदली आर्थिक स्थिति
सरस्वती देवी की कहानी बताती है कि स्वरोजगार के लिए हमेशा बड़ी पूंजी की जरूरत नहीं होती। छोटे स्तर से शुरुआत कर अनुभव और मेहनत के साथ काम को आगे बढ़ाया जा सकता है। स्वयं सहायता समूह से मिले 50 हजार रुपये के ऋण को उन्होंने बोझ न मानकर कमाई का साधन बनाया। आज मशरूम की खेती से होने वाली आय से परिवार को आर्थिक मजबूती मिल रही है। उनकी सफलता से गांव की दूसरी महिलाओं को भी यह भरोसा मिला है कि वे घर-परिवार की जिम्मेदारियों के साथ अपना रोजगार खड़ा कर सकती हैं और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन सकती हैं।

