HomePoliticspolitics:दुर्ग ढह गया तो आगे और मुश्किल होगी, दो गढ़ गंवा चुके...

politics:दुर्ग ढह गया तो आगे और मुश्किल होगी, दो गढ़ गंवा चुके अखिलेश के लिए करो या मरो है मैनपुरी की लड़ाई

politics:दुर्ग ढह गया तो आगे और मुश्किल होगी, दो गढ़ गंवा चुके अखिलेश के लिए करो या मरो है मैनपुरी की लड़ाई

politics: सपा को विरासत में मिली मैनपुरी सीट की लड़ाई अखिलेश के लिए बड़ी हो सकती है।

भले रामपुर और खतौली में उपचुनाव एक साथ ही हों लेकिन अखिलेश यादव का पूरा फोकस केवल मैनपुरी पर है।

हो भी क्यों न। सपा ने यहां से जिसे प्रत्याशी बनाया है वह और

कोई नहीं बल्कि सपा मुखिया अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल यादव हैं।

राजनीतिक दृष्टि से देखा जाए तो मैनपुरी सीट एक तरह से सपा के लिए प्रतिष्ठा बन गई है।

डिंपल को जिताने के लिए यादव कुनबा इन दिनों मैनपुरी में डेरा जमाए हुए है।

खुद अखिलेश यादव मैनपुरी की खाक झांकने में लगे हैं। अखिलेश भले ही

रामपुर और आजमगढ़ लोकसभा उपचुनाव का चुनाव हार गए हों लेकिन मैनपुरी सीट किसी भी कीमत पर गंवाना नहीं

चाहते। इसको लेकर सपा प्रमुख ने पूरी जान लगा रखी है। अखिलेश यादव के सामने मैनपुरी

सीट जीतना सबसे बड़ी चुनौती है। रामपुर और और आजमगढ़ गंवा चुके

अखिलेश के लिए मैनपुरी करो या मरो की लड़ाई बन चुकी है ये कहना भी गलत नहीं होगा।

मैनपुरी सीट अखिलेश अगर हारते हैं तो इस बार उन्हें मुंह की खानी

पड़ेगी। आने वाले दिनों में उनकी मुश्किलें भी बढ़ सकती हैं।

रामपुर और आजमगढ़ में अखिलेश ने कदम तक नहीं रखा, लेकिन मैनपुरी में सपा प्रमुख ने पूरी ताकत झोंक दी है?

सियासी गलियारों में ये सवाल हर जुबां पर है। एक सवाल ये भी है कि मैनपुरी को लेकर

अखिलेश इतनी मशक्कत क्यों कर रहे हैं? वह भी तब जब मैनपुरी सीट सबसे सेफ मानी जाती है।

मैनपुरी वर्षों से सपा के कब्जे में रही हैं। वहीं इसी जिले की जसवंतनगर सीट पर

सपा से विधायक शिवपाल सिंह यादव हैं तो वहीं दूसरी करहल सीट से खुद अखिलेश यादव विधायक हैं।

इसके बाद भी कहीं न कहीं इस सीट को फतह करने को लेकर अखिलेश के मन में

एक डर सा है, लेकिन दूसरी ओर डिंपल की जीत को लेकर उन्हें पूरा विश्वास भी है।

क्यों बड़ी हो सकती है अखिलेश की लड़ाई

अखिलेश यादव अगर मैनपुरी की सीट हारते हैं तो उनके लिए आने वाले चुनाव में चुनौतियां और भी बढ़ जाएंगी।

हालांकि इस सीट पर सपा और भाजपा की सीधी टक्कर है। मैनपुरी में शाक्य बिरादरी की संख्या ज्यादा है।

भाजपा ने जो प्रत्याशी उतारा है वह शाक्य बिरादरी से ताल्लुक रखता है।

वहीं मैनपुरी में सपा का जिलाध्यक्ष भी शाक्य है। ऐसे में दोनों पार्टियों का फोकस शाक्य वोटरों को लुभाने पर ज्यादा है।

पिता की विरासत को बनाए रखेगी सपा?

सपा के लिए सबसे पहली चुनौती है मुलायम सिंह यादव की विरासत को बनाए रखने की है।

वर्षों से सपा के कब्जे में रही यह सीट मुलायम सिंह के निधन के बाद खाली हो गई है।

मुलायम के बड़े बेटे और सपा प्रमुख अखिलेश यादव खुद को इस विरासत को समटने की जद्दोहद में लगे हैं।

यही वजह है कि उन्होंने किसी और प्रत्याशी को यहां से उतारने की वजह अपनी पत्नी डिंपल यादव पर दांव लगा दिया।

क्यों जरूरी था अखिलेश को चाचा शिवपाल का साथ

रामपुर और आजमगढ़ लोकसभा उपचुनाव में मिली हार के बाद अखिलेश यादव ने अब सबक ले लिया है।

यही वजह है कि इन दिनों उनका पूरा फोकस मैनपुरी पर है। मैनपुरी में सीट जीतने के लिए

अब तो अखिलेश को चाचा शिवपाल का साथ भी मिल गया है। 2017 से शिवपाल यादव की अखिलेश से अंदरखाने में

अनबन चल रही थी, जिसे तीन दिन पहले सैफई में दोनों नेताओं ने मुलाकात करके भुला दिया।

शिवपाल ने इस दौरान बहू डिंपल को जीत का भी आशीर्वाद दिया है।

राजनीतिज्ञों की माने तो शिवपाल के अखिलेश के साथ आ जाने से सपा और मजबूत हो गई है।

माना जा रहा है कि शिवपाल की मैनपुरी में काफी पकड़ है। शिवपाल सिंह यादव जसवंतनगर

विधानसभा सीट से सपा से विधायक हैं। यह सीट मैनपुरी जिले में आती है।

राजनीतिक विशेषज्ञों की मानें तो मैनपुरी के मामले में मुलायम सिंह भी शिवपाल यादव से सलाह लिया करते थे।

यही कारण है कि मैनपुरी में अखिलेश को चाचा शिवपाल का साथ लेना जरूरी हो गया था।

मैनपुरी में क्या होगी वोटरों की भूमिका

वैसे तो मैनपुरी में यादव बाहुल्य के ज्यादा लोग हैं, लेकिन यहां दूसरी सबसे बड़ी कास्ट शाक्य है।

यादव और शाक्य वोटरों की बात करें तो दोनों में आंकड़ा मामूली है। यादव कुछ ही ज्यादा हैं।

मुलायम सिंह यादव के दौर में उन्हें शाक्य वोटरों का भी साथ मिला था, लेकिन इस बार शाक्य किस ओर करवट लेंगे।

इसको लेकर कुछ कहा नहीं जा सकता। उधर भाजपा ने भी शाक्य वोटरों को अपनी ओर खींचने के लिए शाक्य कार्ड ही

खेला है। भाजपा प्रत्याशी पुराने सपाई रघुराज शाक्य हैं, जिसे भाजपा ने चुनाव मैदान में उतारा है।

ऐसे में अखिलेश यादव के सामने शाक्य वोटरों को अपनी ओर लाने में एक चुनौती से कम नहीं है।

 

 

RELATED ARTICLES
- Advertisment -

Most Popular

- Advertisment -